आज से 150 सौ साल पहले 10 मई के दिन पूरे भारत में इसलिए मेरठ कैंट से भड़की थी 1857 के गदर की चिंगारी, आज है क्रान्ति दिवस

देश के हर यूथ को ये जानना बेहद जरूरी है की आखिर कैसे भारत को अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी से मिली थी आज़ादी

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न्यूज टुडे नेटवर्क। आज क्रांति दिवस है आज ही के दिन अंग्रेजी हुकूमत से भारत को आजाद कराने के लिए 1857 के गदर की शुरुआत हुयी थी। जिसके बाद आजादी के लड़ाकों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया और आखिरकार 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा था। आईये जानते हैं कि आखिर आजादी की लड़ाई के लिए शुरू हुए 1857 के गदर की शुरुआत कब, कैसे और कहां से हुयी।

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10 मई देश के लिए एक ऐतिहासिक दिन है. आज के दिन साल 1857 में उत्तर प्रदेश के मेरठ से आजादी की पहली लड़ाई की शुरुआत हुई थी ! इस दिन कुछ भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश राज के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था ! अंग्रेजों पर हमला कर इस दिन भारतीय सैनिकों ने मेरठ पर कब्जा किया था !

10 मई 1857 को क्या हुआ था ?

बात डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है. तब भारत में ब्रिटिश राज था और मेरठ का कैंट इलाका एक छावनी इलाका था, जहां सैनिकों के बैरक बने हुए थे ! छावनी में अंग्रेज और भारतीय दोनों सेनाओं के लोग अलग-अलग जगहों पर रहते थे !  अंग्रेज भारतीय सैनिकों के प्लाटून को काली पलटन कहते थे ! काली पलटन बैरक के पास ही एक छोटा सा शिव मंदिर था जहां पर भारतीय सैनिक पूजा-पाठ करने जाते थे ! इसी मंदिर से भारत की आजादी की पहली लड़ाई की शुरुआत हुई !

जब पुजारी ने भारतीय सैनिकों को पानी पिलाने से किया मना

10 मई 1857 को मंदिर के प्याऊ पर कुछ सैनिक पानी पीने के लिए पहुंचे ! प्याउ पर उस समय मंदिर के पुजारी बैठे हुए थे ! सैनिकों ने हमेशा की तरह पुजारी से पानी पिलाने को कहा लेकिन पुजारी ने सैनिकों को अपने हाथ से पानी पिलाने से इंकार कर दिया ! पुजारी ने कहा जो सैनिक गाय और सूअर की चर्बी से बने हुए कारतूस को अपने मुंह से खोलते हैं, उन्हें वह अपने हाथों से पानी नहीं पिला सकते क्योंकि वह पूजा पाठ करने वाले धार्मिक व्यक्ति हैं !   

भारतीय सैनिकों को यह बात इस कदर चुभी कि उन्होंने फैसला कर लिया अब चाहे जो कुछ हो जाए वह कारतूस को मुंह नहीं लगाएंगे ! दरअसल, उस समय सैनिकों को अपनी बंदूक में इस्तेमाल करने के लिए जो कारतूस दिए जाते थे उसे पहले दांतों से काटकर तब बंदूक में लगाना पड़ता था ! कहा जाता था कि इन कारतूसों को बनाने में गाय और सूअर की चर्बी का इस्तेमाल होता था ! इसी कारतूस को लेकर महीने भर पहले बंगाल के बैरकपुर में मंगल पांडे विद्रोह कर चुके थे और यह बात चारों तरफ फैल चुकी थी !  

10 मई, 1857 को रविवार का दिन था ! बहुत से अंग्रेस अफसर उस दिन पास में बने चर्च में गए हुए थे ! उस दिन निशानेबाजी के समय जब कारतूस को खोलने की बारी आई तो भारतीय सैनिकों ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया ! इसी बात पर अंग्रेजों से उनका झगड़ा हो गया, भारतीय सैनिकों ने वहीं पर तीन अंग्रेज अफसरों को मार डाला ! उसके बाद यह बात आग की तरफ फैल गई और बाकी भारतीय सैनिक भी अपने-अपने बैरकों से बाहर निकल आए और अंग्रेजों पर हमला बोल दिया !   

उसके बाद भारतीय सैनिकों ने मिलकर चर्च पर धावा बोल दिया और बहुत सारे अंग्रेजों को वहीं पर मार डाला ! बाद में इन भारतीय सैनिकों के साथ आम लोग भी शामिल हो गए और मेरठ पर भारतीय सैनिकों का कब्जा हो गया ! जल्दी ही यह विद्रोह की चिंगारी आसपास के इलाकों में फैल गई और 1857 के गदर की शुरुआत हुई ! जिसे भारतीय आजादी की पहली लड़ाई कहा जाता है ! 1857 की क्रांति से भारत को आजादी तो नहीं मिली लेकिन आज़ादी की लड़ाई के लिए बेहद मजबूत नींव जरूर पड़ गई !