हल्द्वानी- बच्चों के खराब परिणाम से न हो मायूस, अपनायें डॉ. नेहा के कुछ खास मनोवैज्ञानिक तरीके

सीबीएसई 12वी बोर्ड परीक्षा के परिणाम घोषित हो चुके है। वही अभी भी कई बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आने बाकी है। ऐसे में विद्यार्थी और अभिभावक दोनो ही बोर्ड परिणाम को लेकर चितिंत है। मनोचिकित्सक और मनसा क्लिकिन की ओनर डॉ. नेहा कहती है कि एक ओर कोरोनाकाल में पूरा देश परेशान है। बच्चों के
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हल्द्वानी- बच्चों के खराब परिणाम से न हो मायूस, अपनायें डॉ. नेहा के कुछ खास मनोवैज्ञानिक तरीके

सीबीएसई 12वी बोर्ड परीक्षा के परिणाम घोषित हो चुके है। वही अभी भी कई बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आने बाकी है। ऐसे में विद्यार्थी और अभिभावक दोनो ही बोर्ड परिणाम को लेकर चितिंत है। मनोचिकित्सक और मनसा क्लिकिन की ओनर डॉ. नेहा कहती है कि एक ओर कोरोनाकाल में पूरा देश परेशान है। बच्चों के साथ ही अभिभावकों को भी इस बात को समझने की जरूरत है कि ये समय परीक्षा परिणाम को लेकर चिंता का नहीं वल्की धीरज, सयमं व संवाद को बनाये रखने का है। उनकी माने तो परीक्षा परिणाम के तुरंत बाद ही विद्यार्थियों के मन में कई प्रकार के विचार आते है।

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हल्द्वानी- बच्चों के खराब परिणाम से न हो मायूस, अपनायें डॉ. नेहा के कुछ खास मनोवैज्ञानिक तरीके

परीक्षा में अंको को लेकर, आगे की पढ़ाई, कॉलेज, भविष्य की चिंता, करियर आदी। ऐसे हालातों में डॉ. नेहा सभी को सयमं रखने की सलाह देती है। उनकी माने तो ये वह समय है जब अभिभावकों को अपने बच्चों को थोड़ा समय देना चाहिए, उन्हें खुद के लिए स्पेस देनी चाहिए ताकी वे सही निर्णय ले सकें। उनकी माने तो इस वक्त हर कोई एक परेशानी के दौर से गुजर रहा है, ऐसे में परिणाम सही नहीं आने पर बच्चों को अपमानित करने से या उनपर गुस्सा करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इन हालातों में बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो सकते है।

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मनोचिकित्सक डॉ. नेहा वर्मा ने विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए परिणाम को स्वीकार करने के लिए कुछ मनोवैज्ञानिक तरीके भी हमारी खबर के माध्यम से बताये है। तो आईयें जानते है कि परिणामों के इस दौर को कैसे मनोवैज्ञानिक तरीके से पार करें।

हल्द्वानी- बच्चों के खराब परिणाम से न हो मायूस, अपनायें डॉ. नेहा के कुछ खास मनोवैज्ञानिक तरीके

विद्यार्थियों के लिए सुझाव

डॉ. नेहा शर्मा कहती है कि परीक्षा के परिणाम में 33 प्रतिशत व्यक्ति द्वारा बनाया गया पास होने का एक क्राइटेरिया है। अंक चाहे 33 प्रतिशत हो या 70 प्रतिशत ये कोई विशेष बात नहीं है। उनकी माने तो हर टीचर का कॉपी चैक करने का तरीका अलग होता है। विद्यार्थियों को अंको का कम या ज्यादा आना स्वीकारना होगा न कि दिल पर लेना है। अपनी मेहनत का परिणाम जो भी हो उसे स्वीकार करें परसेंटेज पर विचार न करें। महत्वपूर्ण ‘मॉर्क्स’ नहीं ‘आप’ है इस बात को समझे। माता पिता जो भी कहे उसे समझने की कोशिश करे दिल से न लगायें।

– बच्चे धैर्य बनाये रखे।
– सोच- समझकर निर्णय ले।
– टीचर से राय ले, व कैरियर काउंसलिंग करवायें।
– सकारात्मकता के साथ वर्तमान स्थिती को स्वीकार करके जीवन में आगे बढ़े।

माता-पिता इस तरह सोचें

डॉ. नेहा का कहना है कि अभिभावकों को स्वीकार करना है कि हर बच्चे का आईक्यू अलग होता है। कभी-कभी जो आप अपने बच्चों से चाहते है व उसकी योग्यता व क्षमता से अलग होता है। जो भी 90 प्रतिशत अंक लाये है वे उसे स्वीकारें और वास्तिवक्ता में रहकर आगे के विषयों का चयन करें। पढ़े व आगे पढ़े। कम परसेंटेज लाने वाले छात्र भी जीवन में उचाईयों को छू सकते है। इसलिए अभिभावकों के लिए जरुरी है कि अपने बच्चों की क्षमताओं को समझे। उसको एक कामयाब इंसान बनने में उसकी मदद करें।