देहरादून- उत्तराखंड के पर्यावरण गांधी की ये है कहानी, इस काम के लिए सरकार ने दिया पद्मविभूषण सम्मान

उत्तराखंड में पर्यावरण सुरक्षा को अपना जीवन समर्पित करने वाले हिमालय रक्षक कहलाते है सुंदरलाल बहुगुणा। जिनकी सबसे बड़ी उपलब्धि चिपको आंदोलन है। इसलिए उनको उत्तराखंड में पर्यावरण गांधी और वृक्ष मित्र के नाम से भी जाना जाता है। पर्यावरण के प्रती प्रेम और उसकी सुरक्षा के लिए किये गए कार्यों को देखते हुए सरकार
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देहरादून- उत्तराखंड के पर्यावरण गांधी की ये है कहानी, इस काम के लिए सरकार ने दिया पद्मविभूषण सम्मान

उत्तराखंड में पर्यावरण सुरक्षा को अपना जीवन समर्पित करने वाले हिमालय रक्षक कहलाते है सुंदरलाल बहुगुणा। जिनकी सबसे बड़ी उपलब्धि चिपको आंदोलन है। इसलिए उनको उत्तराखंड में पर्यावरण गांधी और वृक्ष मित्र के नाम से भी जाना जाता है। पर्यावरण के प्रती प्रेम और उसकी सुरक्षा के लिए किये गए कार्यों को देखते हुए सरकार ने इन्हें वर्ष 2009 में पद्मविभूषण अवार्ड से भी नवाजा है। सुंदरलाल बहुगुणा 9 जनवरी, 1927 को उत्तराखंड के टिहरी जिले में जन्मे। 18 साल की उम्र में वह पढ़ने के लिए लाहौर गए।

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मंदिरों में हरिजानों के जाने के अधिकार के लिए आंदोलन

उन्होंने मंदिरों में हरिजानों के जाने के अधिकार के लिए भी आंदोलन किया। 23 साल की उम्र में उनका विवाह हुआ। जिसके बाद उन्होंने गांव में रहने का फैसला किया और पहाड़ियों में एक आश्रम खोला। बाद में उन्होंने टिहरी के आसपास के इलाके में शराब के खिलाफ भी मोर्चा खोला। 1960 के दशक में उन्होंने अपना ध्यान वन और पेड़ की सुरक्षा पर केंद्रित किया। पर्यावरण सुरक्षा के लिए 1970 में शुरू हुआ आंदोलन पूरे भारत में फैलने लगा। चिपको आंदोलन उसी का एक हिस्सा था। उस वक्त गढ़वाल हिमालय में पेड़ों के काटने को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन बढ़ रहे थे।

देहरादून- उत्तराखंड के पर्यावरण गांधी की ये है कहानी, इस काम के लिए सरकार ने दिया पद्मविभूषण सम्मान

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1980 की शुरुआत में बहुगुणा ने हिमालय की 5,000 किलोमीटर की यात्रा की। उन्होंने यात्रा के दौरान गांवों का दौरा किया और लोगों के बीच पर्यावरण सुरक्षा का संदेश फैलाया। इतना ही नहीं उस दौरान सुंदरलाल बहुगुणा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भेंट कर 15 सालों तक के लिए पेड़ों के काटने पर रोक लगाने का आग्रह किया। जिसमें वे सफल भी रहे। बहुगुणा ने टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई थी। उन्हीं की ही अध्यक्षता में टिहरी बांध विरोध समिती 1978 में बनाई गई। उत्तराखंड के इतिहास में उनका नाक आज भी सुनहरें अक्षरों में दर्ज है।