हरेला पर्व 2021 : जानिए क्यों मनाया जाता हैं हरेला और क्या  है इसका  महत्व

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हरेला पर्व 2021 : श्रावण मास में पावन पर्व हरेला उत्तराखंड में धूमधाम से मनाया जाता है। आज से इस पर्व की शुरुआत हो गई है। मानव और प्रकृति के परस्पर प्रेम को दर्शाता यह पर्व हरियाली का प्रतीक है। सावन लगने से नौ दिन पहले बोई जाने वाली हरियाली को दसवें दिन काटा जाता है और इसी दिन इस पावन पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।उत्तराखंड में आज हरेला पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है।ह रेला उत्तराखंड के परिवेश और खेती से जुड़ा पर्व है, जो वर्ष में तीन बार चैत्र, श्रावण और आश्विन मास में मनाया जाता है। हालांकि, लोक जीवन में श्रावण (सावन) मास में पड़ने वाले हरेला को काफी महत्व दिया गया है। हरेला पर्व न सिर्फ नई ऋतु के शुभागमन की सूचना देता है, बल्कि प्रकृति के संरक्षण को भी प्रेरित करता है। इसीलिए उत्तराखंड में हरेला पर्व लोकजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। अब तो इसी दिन से पौधरोपण अभियान शुरू करने की परंपरा भी शुरू हो गई है। कुमाऊं में तो हरेला लोकजीवन का महत्वपूर्ण उत्सव है।

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जी रया जागि रया, यों दिन मास भेटनै रया...।' यानी कि आप जीते-जागते रहें। हर दिन-महीनों से भेंट करते रहें...यह आशीर्वाद हरेले के दिन परिवार के वरिष्ठ सदस्य परिजनों को हरेला पूजते समय देते हैं। इस दौरान हरेले के तिनकों को सिर में रखने की परंपरा आज भी कायम है।

हरेला पर्व का महत्त्व 
श्रावण मास में मनाये जाने वाला हरेला सामाजिक रूप से अपना विशेष महत्व रखता तथा समूचे कुमाऊँ में अति महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक माना जाता है। जिस कारण इस अन्चल में यह त्यौहार अधिक धूमधाम के साथ मनाया जाता है। जैसाकि हम सभी को विदित है कि श्रावण मास भगवान भोलेशंकर का प्रिय मास है, इसलिए हरेले के इस पर्व को कही कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि श्रावण मास शंकर भगवान जी को विशेष प्रिय है। यह तो सर्वविदित ही है कि उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शंकर का वास माना जाता है। इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व है।

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