उलझन में हैं भक्त, कब मनाएं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी ? जानिए ज्योतिष समाधान

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हरिद्वार- न्यूज टुडे नेटवर्क: पिछले कुछ वर्षों से देश में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों के 2 दिन पड़ने की वजह से भक्तों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में इन दिनों भगवान कृष्ण के भक्त भी कुछ ऐसी ही उलझन से गुजर रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाए जाने वाले जन्माष्टमी के त्योहार को लेकर पूरे देश में हर्षोल्लास का माहौल है। लेकिन इस बार जन्माष्टमी को लेकर जनमानस में कुछ संशय बरकरार है। संशय के पीछे का मूल कारण अष्टमी तिथि का दो दिन रहना बताया जा रहा है।

इस वजह है जन्माष्टमी को लेकर संशय

ज्योतिषाचार्यों की मानें तो इस बार अष्टमी तिथि 2 एवं 3 सितंबर को रहेगी जिसके चलते श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मनाए जाने को लेकर विद्वानों में मतभेद है। ज्योतिष के कुछ जानकर रात्रिकालीन अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र को मान्यता दे रहे हैं तो कुछ सूर्योदयकालीन अष्टमी तिथि को मान्यता दे रहे हैं। यही वजह है कि आम जनमानस में जन्माष्टमी को लेकर असमंजस बरकरार है।

पं. रमेश चन्द्र पाण्डेय बताते हैं कि शास्त्रानुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में रात्रि के 12 बजे हुआ था। हर वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिवस मनाया जाता है। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के दिन रात्रि में अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र का होना अनिवार्य है।

जन्माष्टमी कब है ?

इस वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि 2 एवं 3 सितंबर दोनों ही दिन रहेगी। इस वर्ष 2 सितंबर को रात्रि 8 बजकर 46 मिनट से अष्टमी तिथि का प्रारंभ हो जाएगी एवं 3 सितंबर को अष्टमी तिथि 7 बजकर 19 मिनट पर समाप्त होगी। वहीं रोहिणी नक्षत्र का प्रारंभ 2 सितंबर को रात्रि 8 बजकर 48 से होगा एवं 3 सितंबर को रात्रि 8 बजकर 08 मिनट पर रोहिणी नक्षत्र समाप्त होगा।

ऐसे में रात्रि के 12 बजे केवल 2 सितंबर को ही अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र रहेगा। पंचांगों में भी स्मार्त (गृहस्थ) के लिए कृष्णजन्माष्टमी का व्रत 2 सितंबर को एवं वैष्णवों के लिए 3 सितंबर को निर्धारित किया गया है। ऐसे में शास्त्रानुसार, जन्माष्टमी का पर्व वैष्णव परम्परा के अनुसार 3 सितंबर को मनाया जाएगा।