काशीपुर- माँ बाल सुंदरी मंदिर है अटूट आस्था का केन्द्र, यहाँ लगता है मशहूर चैती मेला

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काशीपुर- न्यूज टुडे नेटवर्क: देवभूमि उत्तराखंड के तराई भाबर क्षेत्र काशीपुर में स्थित है 52 शक्तिपीठों में से एक है मां बाल सुंदरी का मंदिर। माँ भगवती का यह नाम उनके द्वारा बाल रूप में की गई लीलाओं की वजह से पडा है। माँ भगवती के इस मंदिर को पूर्व में उज्जैनी एवं उकनी शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता था।

काशीपुर स्थित मां बाल सुंदरी का मंदिर का मनमोहक प्रवेश द्वार

दशकों पहले माता की महिमा के चलते ही मुगल शासक औरगंजेब ने इस मंदिर का जीर्णोद्वार कराया था। आज भी इस मंदिर पर बने तीन गुंबद मुगलवंशीय शिल्प कला की याद दिलाते हैं। पुराणों के अनुसार जब भगवान शिव, माता सती के जले हुए शरीर को लेकर पूरे लोक का भ्रमण कर रहे थे तभी माता सती के बांह का अंग यहां पर गिरा और यहां पर शक्तिपीठ स्थापित हो गया।

मां बाल सुंदरी मंदिर में आयोजित होता है मशहूर चैती मेला

यूं तो माँ बाल सुंदरी के इस प्राचीन और दिव्य मंदिर में चैत्रमास में भक्तों का अनूठा संगम देखने को मिलता है। नवरात्रों के अवसर पर माँ बाल सुंदरी के दरबार में लगने वाला प्रसिद्ध चैती मेला देश- दुनिया से लाखों लाख भक्तों को अपनी तरफ आकर्षित करता है। इस मंदिर में किसी देवी की मूर्ति नहीं बल्कि एक पत्थर पर बांह का आकार गढा हुआ है, यहां पर माँ के इसी रूप की पूजा की जाती है।

मां बाल सुंदरी मंदिर

मुगल शासक औरंगजेब जब बना माता का भक्त

मंदिर के मुख्य पुजारी विकास अग्निहोत्री बताते हैं कि उनके पूर्वज गया दीन और बंदी दीन कई सौ वर्ष जब यहां से गुजर रहे थे तभी उन्हें यहां पर दिव्य शक्ति होने का अहसास हुआ और उन्हें देवी का मठ मिला। उन्होंने यहां पर भव्य मंदिर बनाने के लिए तत्कालीन शासकों से कहा। उस समय भारत पर औरंगजेब का शासन चलता था। औरगंजेब ने यहां पर मंदिर बनाने से मना कर दिया।

इस बीच औरगंजेब की बहन जहांआरा का स्वास्थ्य खराब हो गया। उस पर किसी की भी दवा का असर नहीं हो रहा था। माता ने बाल रूप में जहांआरा को दर्शन दिए और उसे कहा कि उसका भाई औरंगजेब मंदिर का जीर्णोद्वार कराए तो वह स्वस्थ हो जायेगी। यह बात जब जहांआरा ने अपने भाई औरंगजेब को बताई तो उसने खुद अपने मजदूर भेज कर मंदिर का जीर्णोद्वार कराया। आज भी मंदिर के उपर बनी मस्जिद नुमा आकृति एवं 3 गुंबद इस बात को प्रमाणित करते हैं।

अद्भुत चमत्कारों का केन्द्र है माँ बाल सुंदरी मंदिर

मान्यता है कि आदिशक्ति की बाल रूप में पूजा होने के कारण ही इसे बाल सुंदरी कहा जाता है। माता बाल सुंदरी बुक्सा जाति की कुल देवी हैं। इसी वजह से यहां पर बुक्सा जाति के लोग वर्ष में एक बार माता के जागरण का विशाल आयोजन करते हैं।

मंदिर परिसर में एक विशाल कदंब का वृक्ष है, जो नीचे से खोखला होने पर भी ऊपर से हरा भरा है। इसके साथ ही माँ के पवित्र धाम में एक ऐसा पेड़ भी है जिसमें पीपल, पिलखन, बरगद, गूलर व आम की पत्तियां हैं। यही वजह है कि माँ बाल सुंदरी के इस पवित्र मंदिर में भक्तों की आस्था और विश्वास का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

माँ बाल सुंदरी मंदिर में होता है चर्म रोगों का खात्मा

मां बाल सुंदरी के इस मंदिर में खुजली देवी का मंदिर भी है। ऐसी मान्यता है कि चर्म रोग से पीडित लोग यहां आकर पूजा अर्चना करते हैं तो चर्म रोगों से तत्काल छुटकारा मिल जाता है। यही वजह है कि देश – दुनिया से तमाम श्रद्धालुओं , माँ के इस अनूठे मंदिर में आकर अपने चर्म रोग से मुक्ति पाते हैं।

मां बाल सुंदरी मंदिर में उत्तराखंड पर्यटन विभाग द्वारा लगाया गया आकर्षक सूचना पट्ट

माँ बाल सुंदरी मंदिर में उत्तराखंड पर्यटन का सूचना पट्ट है आकर्षण का केन्द्र

अटूट आस्था के केन्द्र, माँ बाल सुंदरी मंदिर को उत्तराखंड़ सरकार ने भी संवारने को कदम बढाए हैं। इसी के तहत पर्यटन विभाग ने मंदिर में एक आकर्षक सूचना पट्ट भी लगवाया है, जिसमें माँ बालसुंदरी के इस पवित्र धाम के महात्म्य के साथ-साथ इस धाम से क्षेत्र के दूसरे पर्यटक स्थलों की जानकारी भी दी गई है। जिससे माँ के इस धाम में आने वालो श्रद्धालुओं को निकटवर्ती पर्यटक स्थलों की जानकारी सहजता से मिल सके।

इस सूचना पट्ट में दर्शनीय स्थलों की दूरी संबधी जानकारी दी गई है , जिसके अनुसार , मां बाल सुंदरी मंदिर से पंतनगर की दूरी 62 किलोमीटर, काशीपुर की दूरी 3 किलोमीटर, नानकमत्ता की दूरी 106 किलोमीटर, बौर जलाशय की दूरी 51 किलोमीटर और अटरिया मंदिर की दूरी 58 किलोमीटर है।