सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, समलैंगिकता अब अपराध नहीं

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नई दिल्ली- न्यूज टुडे नेटवर्क : देश की शीर्ष अदालत ने आज धारा 77 पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, सुप्रीम कोर्ट भारतीय दंड संहिता की धारा 77 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। आईपीसी का ये सेक्शन समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखता है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली संवैधानिक पीठ ने दो बालिगों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 77 को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने धारा 77 को मनमाना करार देते हुए व्यक्तिगत पसंद को सम्मान देने की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवर्तन जरूरी है। देश में रहने वाले व्यक्ति का जीवन का अधिकार मानवीय है, इस अधिकार के बिना सारे बेतुका है। पीठ ने अपने आदेश में कहा, हमें पुरानी धारणाओं को बदलने की जरूरत है। नैतिकता की आड़ में किसी के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। सामाजिक नैतिकता संवैधानिक नैतिकता से ऊपर नहीं है। सामाजिक नैतिकता मौलिक आधार को नहीं पलट सकती। यौन व्यवहार सामान्य, उस पर रोक नहीं लगा सकते।

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धारा 77 के विरोध के पीछे क्या है तर्क ?

आईपीसी की धारा 77 के विरोध पर याचिका दायर करने वाले मुकुल रोहतगी का कहना था कि मनुष्य के पैदा होने से ही सेक्स के प्रति उसका रुझान अलग तरह का होता है, याचिका में तर्क दिया गया है कि सेक्स के प्रति किसी का झुकाव प्राकृतिक होता है, यह उनकी निजता का सवाल है। ऐसे में धारा 77 के कारण LGBTQ समुदाय को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इसी साल जुलाई में हुई थी सुनवाई

इसी साल जुलाई महीने में 77 पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। आईपीसी की धारा 77 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर महज 4 दिन ही सुनवाई चली थी। पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई कानून मौलिक अधिकारों का हनन करता है तो कोर्ट इस बात का इंतजार नहीं करेगा कि सरकार उसे रद्द करें।

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क्या कहती है धारा 77?

भारतीय दंड संहिता की धारा 77 में अप्राकृतिक अपराध का जिक्र है। इस धारा में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि जो भी प्रकृति के नियम के विरुद्ध किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ यौनाचार करता है, उसे उम्रकैद या दस साल तक की कैद और जुर्माना देने का प्रावधान है। बता दें कि इस धारा के तहत जमानत न मिलने का प्रावधान है।

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क्या कहते हैं धारा 77 का समर्थन करने वाले लोग

इस कानून के समर्थन के दौरान कोर्ट में देश की सुरक्षा पर ध्यान आकर्षित किया गया, वकील ने कहा कि सेना के जवान परिवार से दूर रहते हैं और इस कानून में बदलाव के बाद वो अप्राकृतिक सेक्शुअल एक्टिविटी में शामिल हो सकते हैं, कानून के हटने पर पुरुष वेश्यावृत्ति को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने इसे समानता का अधिकार और मानव निजता का अधिकार मानते हुए समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है, अदालत का कहना है कि सबको समानता से जीने का अधिकार है।