2 June 2018- “2 जून की रोटी” इसका मतलब आपको पता है, जानें इसके पीछे की कहानी

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हल्द्वानी[न्यूज टुडे नेटवर्क]. दो जून की रोटी एक मुहावरा है. इसका जून महीने से कोई नाता नहीं है. बचपन में पढ़ी गई किताबों में हमने ऐसे-ऐसे कई मुहावरे पढ़े हैं. जिनका अर्थ हमें अपने जीवन में ही मिल जाता है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक विक्रम विवि के कुलानुशासक शैलेंद्र कुमरा शर्मा बताते हैं कि यह भाषा का रूढ़ प्रयोग है. साफ-साफ कह जाए तो यह करीब 600 साल पहले से प्रचलन में है. किसी घटनाक्रम की विशेषता बताने के लिए मुहावरों को जोड़कर प्रयोग में लाया जाता था. और यह क्रम आज तक जारी है.

दो जून मतलब दो समय का खाना

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक संस्कृत विद्वान शास्त्री कौशलेंद्रदास बताते हैं कि…

दो जून अवधि भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ वक्त या समय होता है. इससे ही यह कहावत अस्तित्व में आई है.

“दो जून की रोटी” पर एक कहानी

राम ने आज अपने स्कूल में नया पाठ पढ़ा था. और वो इसी खुशी में इठलाकर चल रहा था कि वो जाकर अपनी मां को ये पाठ सुनाएगा. किसी के उतरे हुए और कहीं-कहीं से फटे हुए कपड़े पर कुछ टुकड़े लगाकर सिले गए हल्के रंग के स्कूल के कपड़ों में वो खुद को कहीं का राजा समझता था. उसके दोस्त उसे उतरन का पहनावा कहकर चिढ़ाने की कोशिश भी करते थे, तब भी उसकी मुस्कान कभी कम नहीं होती थी, क्योंकि उसे लगता था कि दुनिया में बस दो ही लोग हैं जो सच कहते हैं एक उसकी मां और दुसरी उसकी मैडम. मैडम शब्द भले उसे पुकारना न आता हो लेकिन मां ने समझाया था कि उनकी कही हर बात उतनी ही सच्ची हैं, जितनी कि भगवान की उनके घर में उपस्थिति. राम का बाल-मन कभी नहीं मान पाया था कि भगवान नाम कुछ होता है. मिट्टी से बने एक लिंग को जिसे मां भगवान कहती है, वो यदि सच है तो उसे क्यों नहीं दिखते, वो यदि हैं उसमें तो कहां है. ऐसे कई भारी-भारी सवाल थे, जिनके जवाब राम की मां को भी नहीं पता थे. लेकिन अब बाल-मन माने भी तो कैसे कि मां को कुछ पता नहीं हो सकता.

जितनी राम के लिए अक्षरों की दुनिया नई थी, उतनी ही उसकी मां के लिए भी. ऐसे में जब वो कोई सवाल का जवाब नहीं दे पाती, तो राम से कहती कि जब वो बड़ा हो जाए तो खुद ही जवाब खोज लेना. इन सब विचारों के साथ चलते-चलते राम को याद आया कि श्याम की मां ने उसे स्कूल छोड़ने को कहा है. क्योंकि अब वो स्कूल की फीस नहीं भर सकती. राम ने अपना रास्ता श्याम के घर की तरफ मोड़ लिया, और उसके घर जाके स्थिति को समझने का निर्णय लिया.

राम जब श्याम के घर पहुंचा तो वहां अजीव स्थिति हो रखी थी, श्याम की मां रो रही थी, तो उसके बापू उदास से बैठे थे. राम ने श्याम से कारण पूछा तो उसने बत्या कि अव से उन्हें शायद दो जून की रोटी भी नहीं मिल सकेगी. राम ने जब श्याम से इसका मतलब पूछा तो श्याम के पास इसका कोई जवाब नहीं था, अपने दोस्त को उदास देखकर राम ने कहा कि रोटी न सही वो भात खा सकता है. रोटी कौन सा सेहत के लिए बड़ी अच्छी होती है. एक तो इतनी मोटी होती है ऊपर से चबानी भी पड़ती है, कभी जल गई तो और समस्या. भात का क्या है न अच्छी सब्जी की जरूरत बस गप्प से मुंह में गया और कहां घुल गया पता भी नहीं चलता. श्याम को राम के तर्क में दम लगा, उसने भी अपनी समझदारी दिखाते हुए कहा कि हां! भात तो मां अपने हाथ से भी खिला सकती है, वर्ना हम ज्यादा गिरा देते हैं न. उसने राम को सम्मान की दृष्टि से देखा, जैसे राम ने कोई रहस्य सुलझा दिया हो. राम अपनी बुद्धिमत्ता से बहुत खुश हुआ, लेकिन रोटी के साथ जुड़े 2 जून के शब्द को वो भी नहीं समझ पाया. अब इसे पता लगाना ही उसका अगला उद्देश्य था. अब राम कुछ क्षणों में अपने सवालों की टोकरी लेकर मां के सामने था, उसने पूछा-मां, रोटी किससे बनती हैं? मां ने कहा- आटे से. अभी राम को समझ आया उसने मन में सोचा कि “तो जून कोई आटे का नाम है? हां! यही होगा वो भी तो 2 किलो आटा लाकर देता है मां को, परचून की दूकान से और ध्यान से दूकानदार को डायरी में 2 किलो ही लिखवाकर भी आता है, तारीक के साथ. कितना जिम्मेदार हैं राम” राम एक बार फिर से अपनी बुद्धि पर गौरवान्वित हुआ. अभी उसे जाकर श्याम को बताना चाहिए कि वो जून की जगह किलो की रोटी भी खा सकता है.

अगली सुबह जब राम स्कूल पहुंचा, तो हर किसी ने उससे श्याम के बारे में पूछा. उसने सबको बताया कि श्याम को अब 2 जून की रोटी नहीं मिलेगी तो उसकी मां फीस नहीं भरेगी, इसलिए वो स्कूल नहीं आएगा. उसने कक्षा में भी इस जिम्मेदारी को बखूबी से निभाया. उसकी मैडम को जब ये बात पता चली, तो उन्होंने राम को पास बुलाकर श्याम की स्थिति सही से जानने की कोशिश की. अभी राम का उत्साह चरम पर था, उसने न केवल पूरी बात बताऊ बल्कि उसने अपनी समझजारी भी मैडम को बताई, की कैसे उसने श्याम की समस्या को हल कर दिया.

मैडम स्तब्ध थी बाल-मन की दी हुई इस नही परिभाषा से. वो कहना चाहती थी कि 2 जून की रोटी का मतलब है वो आवश्यक भोजन जो तुम्हें सुबह-शाम मिलता है. जिसके लिए किसान महीनों खेत में हल चलाता हैं, जिसके लिए मजदूर भरी दोपहर में अपना पसीना बहाता है. जिसके लिए राम की मां घर-घर जाकर काम करती है. ऐसा जाने कितना कुछ था मैडम के मन जो वो गोपाल को समझाना चाहती थी, लेकिन आंखो में अटके आंसू गले से निकलने वाली आवाज को रोक रहे थे. मैडम ने राम को अगले दिन श्याम को स्कूल लाने और फीस की चिंता न करने का निर्देश दिया, और मिड-डे-मिल के प्रबन्धन में दिल से लग गई.

अब वहां स्कूल के उस माहौल में एक दृढ़-निश्चय था परिवर्तन का, एक उम्मीद थई नई संभावनाओं की, जगी हुई मानवीय सम्वेदनाए थी, करूणा थी जो अपना मार्ग खोज रही थी, समझ थी जरूरत की, और साथ में था राम का मासूम सा सवाल- मैडम मैंने श्याम को सही सुझाव दिया न? उसे 2 जून की रोटी की खाने की जगह भात खाने की सही सलाह दी न? राम मैडम की नजरों में भी पक्का करना चाहता था वो सम्मान जो उसे श्याम ने दिया था, लेकिन मैडम ये नहीं समझ पा रही थी कि उसे कैसे समझाए कि 2 जून की रोटी का संबंध सिर्फ खाने से नहीं कमाने से भी है…

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