उत्तराखंड़- कुमाऊं का लोकपर्व ‘घुघुतिया त्यार’ होगा इस बार कुछ खास, 14 जनवरी को बन रहा है ये अद्भुत संयोग

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हल्द्वानी- मकर संक्रांति पर आयोजित घुघतिया त्यार कुमाऊं का लोक पर्व है। कुमाऊं की काशी बागेश्वर में सरयू-गोमती तट के साथ ही रानीबाग, पंचेश्वर व टनकपुर के शारदा तट पर मेला लगता है। शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन, जबकि दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है। मकर संक्रांति देवताओं का प्रात: काल है। इस दिन स्नान, दान, जप, तप, अनुष्ठान व श्राद्ध का अत्यधिक महत्व है।

 कुमाऊं का लोकपर्व 'घुघुतिया त्यार'

अद्भुत संयोग वाली है इस बार की मकर सक्रांति

इस बार मकर संक्रांति पर अद्भुत संयोग बन रहा है। ऐसे में स्नान-दान करने से आपको दो गुना फल मिलेगा। इस बार मकर संक्रांति का आगमन सवार्थ सिद्धि योग में आ रहा है। ज्योतिषों के मुताबिक ऐसा 6 साल बाद हो रहा है कि रविवार को ही मकर संक्रांति पड़ रही है। इसके साथ ही संक्रांति पर्व पर मूल नक्षत्र, सिंह लग्न और ध्रुव योग के संयोग शुभ फल प्रदान करने वाले हैं।

14 जनवरी को सुबह से ही पर्व काल प्रांरभ हो जाएगा। लेकिन पुण्य काल दोपहर 1 बजकर 44 मिनट पर सूर्य का धनु से मकर राशि में प्रवेश के साथ शुरू होगा। वहीं इस दिन सूर्य अस्त सांय 5 बजकर 40 मिनट पर होगा। इसके चलते श्रद्धालुओं को स्नान-दान के लिए पुण्यकाल 3 घंटे 55 मिनट की अवधि के लिए ही रहेगा। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक पुण्य काल में किया गया स्नान-दान अधिक प्रभावकारी होता है।

 कुमाऊं का लोकपर्व 'घुघुतिया त्यार'

सूर्य का राशि बदलना कहलाता है सक्रांति

सूर्य अभी धनु राशि में है। 14 जनवरी को धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे। मकर संक्रांति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रांरभ होती है। इसलिए इस पर्व को उत्तरायणी भी कहा जाता है। भले ही 14 जनवरी को सुबह से ही पर्व काल प्रांरभ हो जाएगा। लेकिन पुण्य काल दोपहर 1 बजकर 44 मिनट पर सूर्य का धनु से मकर राशि में प्रवेश के साथ शुरू होगा। भगवान सूर्य के धनु राशि में प्रवेश के साथ ही स्नान-दान और पूजन का पर्व मकर संक्रांति इस साल सर्वार्थ सिद्धि योग में आ रहा है। सूर्य के राशि बदलने की प्रक्रिया को संक्रांति कहा जाता है।

रानीबाग में होती है जीयारानी की पूजा

 कुमाऊं का लोकपर्व 'घुघुतिया त्यार'
रानीबाग स्थित जियारानी की ऐतिहासिक गुफा

कुमाऊं में कत्यूरियों ने करीब ढाई हजार साल से अधिक समय तक शासन किया। मान्यता है कि कत्यूरी वंश के महाराज धामदेव की महारानी जिया हल्द्वानी के रानीबाग स्थित गुफा में विलुप्त हो गई। जिया रानी के नाम से इस स्थान का नाम रानीबाग पड़ा।

हर साल मकर संक्रांति पर मेला लगता है और आज भी कत्यूरी वंशज रानीबाग आकर ढोल नगाड़ों व निशान के साथ देवनृत्य कर स्नान को आते हैं।

काले कौव्वा काले, घुघती माला खाले….

कुमाऊं में घुघतिया त्यार पर आटे के मीठे पकवान तैयार किए जाते हैं। जबकि बच्चे सुबह से ही काले कौव्वा काले, घुघति माला खा ले..कहकर कौवों को बुलाते हैं। माना जाता है कि कौवों को खिलाया गया पकवान पूर्वजों तक पहुंचता है। वहीं इस दिन का ऐतिहासिक महत्व भी है। 21 जनवरी 1921 को कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे, कुमाऊं परिषद के हरगोविंद पंत, चिरंजीलाल वर्मा के नेतृत्व में बागेश्वर के सरयू किनारे हजारों लोगों ने कुली बेगार प्रथा का अंत किया।

एक मान्यता के अनुसार कुमाऊं में चंद शासक कल्याण चंद की कोई संतान नहीं थी। भगवान बागनाथ की कृपा से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिसका नाम निर्भय चंद था। मां उसे घुघुती नाम से पुकारती थीं। उसके गले में रत्नजडि़त मोतियों की माला थी, जो निर्भय चंद को पसंद थी। जब भी वो रोता भोन नहीं करता तो मां कहती कि तेरी माला कौवों को दे दूंगी। आ कौवा आ कहकर पुकारने लगती को घुघुती खुश हो जाता। पुकारने पर कौवे आने लगे तो उनकी दोस्ती घुघुती से हो गई। राजा का मंत्री राज्य हड़पना चाहता था तो उसने घुघुती का अपहरण कर लिया, कौवों ने उसे देख लिया और घुघुती के गले से मोती की माला लेकर राजा के पास आ गए। कौवों की सहायता से मंत्री को पकड़कर मृत्यु दंड दिया गया। तभी से राजा-रानी कौवों को मीठे आटे के पकवान बनाते थे।

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